सोमवार 23 मार्च 2026 - 21:31
धर्म बेचने वाले मुफ्ती

आज का सबसे बड़ा फ़ितना (उपद्रव) यह नहीं है कि सच्चाई कमज़ोर है, बल्कि यह है कि असत्य को सच्चाई का चोला पहनाकर बेचा जा रहा है। धार्मिक मूल्यों को इस तरह घुमाया जा रहा है कि अत्याचार, न्याय प्रतीत हो और प्रतिरोध, अपराध नज़र आए। जब भाषा बदल दी जाए तो दिमाग बदलने में देर नहीं लगती, और जब दिमाग बदल जाएं तो विवेक (ज़मीर) अपने आप मर जाता है।

लेखक: मौलाना सैयद करामत हुसैन शऊर जाफ़री

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी I शायद ज़माना वैसा ही है… मगर नज़र बदल गई है। सच अब भी सच है, मगर उसे पहचानने वाली आँखें धुंधली पड़ गई हैं। मेहराब और मिम्बर अब भी क़ायम हैं, मगर उनकी आवाज़ों में वह साहस बाकी नहीं रहा जो कभी ज़ुल्म के महलों को हिला दिया करता था। कभी यही स्थान थे जहाँ से सच, सच कहलाता था और असत्य, असत्य। मगर आज वही मिम्बर ऐसे शब्द अदा कर रहे हैं जो हकीक़त को धुंधला देते हैं और धोखे को दलील का वस्त्र पहना देते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि बदलाव ज़माने में नहीं आया… बल्कि मनुष्य के भीतर उतर गया है।

और यह कोई अचानक पैदा होने वाला विचलन नहीं, बल्कि एक लंबी ऐतिहासिक निरंतरता का परिणाम है। इतिहास के पन्ने खोलकर देखिए तो एक कड़वी हकीक़त बार-बार सामने आती है कि जब भी सत्ता और धर्म का गठजोड़ हुआ, सबसे पहले विवेक की कीमत लगाई गई। बनी उमय्या के दौर में जब ख़िलाफ़त बादशाहत में बदल गई तो दरबारों को ऐसे विद्वानों की आवश्यकता थी जो ज़ुल्म को "अमीर की आज्ञाकारिता" का लिबास पहना सकें। अतः वही हुआ—कर्बला के मैदान में तलवारें कम थीं, फ़तवे  अधिक थे। सच्चाई को बाग़ी और असत्य को ख़लीफ़ा साबित करने के लिए मिम्बर का इस्तेमाल किया गया और धर्म की भाषा को राजनीति की प्रवक्ता बना दिया गया।

कर्बला केवल एक युद्ध नहीं था, वह विवेक की परीक्षा थी। एक तरफ इमाम हुसैन (अ) थे, जिनके पास सच था मगर ताकत नहीं; और दूसरी तरफ यज़ीद बिन मुआविया था, जिसके पास ताकत थी मगर सच नहीं। मगर इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं कि यज़ीद जीत गया—बल्कि यह है कि कुछ विद्वानों ने उसकी जीत को "वैधता" प्रदान की। यही वह मोड़ था जब फ़तवों ने तलवार का साथ दिया, और मिम्बर ने दरबार के सामने सिर झुका दिया।

यह परंपरा यहीं समाप्त नहीं हुई। बनी अब्बास के दौर में "उलमा-ए-सलातीन" का एक पूरा समूह सामने आया, जिनका काम शासकों के हर कदम को शरई रंग देना था। ज़ुल्म को "मस्लहत" कहा गया, जबर को "हिकमत" का नाम दिया गया, और चुप्पी को "तक़्वा" बनाकर पेश किया गया। इस प्रकार धर्म का वह चेहरा, जो न्याय, साहस और सच्चाई का आईना था, धीरे-धीरे धुंधला गया, और उसके स्थान पर एक ऐसा चेहरा सामने आया जो भय, स्वार्थ और समझौते का प्रवक्ता था।

फिर इतिहास ने एक नया मोड़ लिया। उपनिवेशवाद का दौर आया, और विवेक की बिक्री ने एक नया वस्त्र पहन लिया। अब फ़तवे केवल राजाओं के लिए नहीं बल्कि साम्राज्यवादी ताकतों के लिए दिए जाने लगे। कहीं जिहाद को विद्रोह कहा गया, कहीं ग़ुलामी को शांति का नाम दिया गया, और कहीं प्रतिरोध को फ़साद करार देकर दबाने की कोशिश की गई। मानो क़लम और मिम्बर दोनों को एक ऐसी ज़ंजीर में जकड़ दिया गया जिसका सिरा सत्ता के महलों में था।

और आज हम इसी पुरानी कहानी का एक और अध्याय देख रहे हैं। भाषा बदल गई है, लहजा शिष्ट बना दिया गया है, शब्दावली को "शैक्षिक" रंग दे दिया गया है—मगर हकीक़त आज भी वही है: ये धर्म बेचने वाले मुल्ला और मुफ्ती एक बार फिर धर्म और ईमान का सौदा करके फ़तवे बेच रहे हैं, शब्दों को सजाकर विवेक की कीमत वसूल कर रहे हैं, और धर्म के नाम पर धर्म की ही आत्मा को घायल कर रहे हैं।

हाल के दिनों में जामिया अल-अज़हर के सरकारी बयान ने इस व्यवहार को पूरी तरह से उजागर कर दिया है। एक तरफ ईरान की कार्रवाइयों को बेझिझक "अनुचित आक्रामकता" करार दे दिया गया, और दूसरी तरफ इस खुली हकीक़त पर पर्दा डाल दिया गया कि यह सब उस पृष्ठभूमि में हो रहा है जहाँ अमेरिका और इज़राइल का स्पष्ट हस्तक्षेप, अरब देशों में स्थापित उनके सैन्य अड्डे, और निरंतर सैन्य दबाव मौजूद है।

सवाल सीधा और कड़वा है: जब वास्तविक हमलावर—अमेरिका और इज़राइल—का नाम लेने से परहेज़ किया जाए, और उन अरब शासकों का ज़िक्र तक न हो जो अपनी भूमि इस आक्रामकता के लिए उपलब्ध करा रहे हैं, तो फिर न्याय कहाँ बाकी रह जाता है? यह संतुलन नहीं, बल्कि खुला पक्षपात है; यह विश्लेषण नहीं, बल्कि हकीक़त से भागना है।

यह केवल एक राय नहीं, बल्कि स्पष्ट झुकाव है। यह वह चुप्पी है जो बोलती है, और वह बयान है जो हकीक़त को छुपाता है। जब शक्तिशाली का नाम लेने से परहेज़ किया जाए और प्रतिक्रिया देने वाले को ही अपराधी बना दिया जाए, तो यह न्याय नहीं—साफ़ पक्षपात है।

यहाँ समस्या किसी एक फ़तवे की नहीं, बल्कि पूरी विचारधारा के बिगड़ने की है। जब धर्म के प्रतिनिधि सत्ता के दरवाज़ों पर जा खड़े हों तो शब्द नहीं, विवेक बदलते हैं। न्याय सबसे पहले क़ुरबान होता है, सच्चाई सबसे पहले पीछे डाल दी जाती है, और स्वार्थ  को धर्म का नाम दे दिया जाता है। फिर फ़तवा नहीं निकलता—हुक्मनामा जारी होता है, जिसमें सच कम और सत्ता की प्रसन्नता अधिक होती है।

यह वह चरण होता है जहाँ धर्म की रोशनी धुंधली कर दी जाती है और उसके स्थान पर एक ऐसा ढाँचा खड़ा किया जाता है जो दिखने में धार्मिक, मगर हकीक़त में स्वार्थ का प्रवक्ता होता है। सच को उलझा दिया जाता है, असत्य को सजा दिया जाता है, और जनता के सामने ऐसा नक़्शा पेश किया जाता है जिसमें अत्याचार छिप जाए और अत्याचार का विरोध ही अपराध बन जाए।

क़ुरआन इस अवसर पर किसी मस्लहत, किसी दबाव, किसी प्रसन्नता को नहीं मानता—वह सीधा कहता है: न्याय पर स्थिर रहो, चाहे वह तुम्हारे अपने विरुद्ध ही क्यों न हो।

"ऐ ईमान वालो! न्याय के साथ खड़े रहने वाले बनो।" (सूर ए निसा: १३५)

अर्थात न्याय पर स्थिर रहो, भले ही वह तुम्हारे विरुद्ध ही क्यों न हो।

और एक अन्य स्थान पर: "तो जो कोई तुम पर अत्याचार करे, तो तुम भी उस पर उसी प्रकार अत्याचार करो।" (सूर ए बकरा: १९४)

अर्थात अत्याचार का उत्तर दिया जा सकता है—मगर न्याय के साथ।

अब सवाल यह है कि क्या हमारे बयानों में यह क़ुरआनी संतुलन मौजूद है? क्या पीड़ित और शक्तिशाली दोनों के लिए एक ही मापदंड अपनाया जा रहा है? यदि नहीं, तो फिर समस्या केवल मतभेद की नहीं बल्कि विचलन की है।

आज का सबसे बड़ा फ़ितना यह नहीं कि सच कमज़ोर है, बल्कि यह है कि असत्य को सच का चोला पहनाकर बेचा जा रहा है। धार्मिक मूल्यों को इस तरह घुमाया जा रहा है कि अत्याचार, न्याय प्रतीत हो और प्रतिरोध, अपराध नज़र आए। जब भाषा बदल दी जाए तो दिमाग बदलने में देर नहीं लगती, और जब दिमाग बदल जाएं तो विवेक अपने आप मर जाता है।

यह वह ख़तरनाक चरण है जहाँ राष्ट्र तलवार से नहीं, धोखे से हारते हैं। उन्हें मारा नहीं जाता—उन्हें समझाया जाता है कि वे पहले से ही सही हैं। उन्हें दबाया नहीं जाता—उन्हें मना लिया जाता है कि अत्याचार ही व्यवस्था है और चुप्पी ही मुक्ति है। यही वह ज़हर है जो नसों में उतारा जाता है, धीरे-धीरे, और जब तक एहसास होता है… सब कुछ बदल चुका होता है।

यह लेख किसी एक व्यक्ति या संस्था पर हमला नहीं, बल्कि एक घातक व्यवहार का पर्दाफ़ाश है—वह व्यवहार जिसमें धर्म को ढाल बनाकर उसी धर्म के सिद्धांतों का गला घोंटा जाता है। यह याद दिलाना नहीं, एक चेतावनी है कि इतिहास केवल घटनाओं को दर्ज नहीं करता, वह चेहरों से नक़ाब भी उतारता है, और शब्दों से अधिक ख़ामोशियों का हिसाब लेता है।

कल जब यह दौर इतिहास की कसौटी पर खड़ा होगा तो केवल यह नहीं पूछा जाएगा कि किसने क्या कहा, बल्कि यह भी देखा जाएगा कि किसने सच को छुपाया, किसने असत्य को सहारा दिया, और किसने विवेक बेचकर चुप्पी अपनाई। वहाँ न शब्द बचाएंगे न व्याख्याएँ—केवल सच खड़ा होगा।

याद रखें, चुप्पी कोई पनाह नहीं होती।

यह एक फ़ैसला होती है।

या तो वह हक़ के साथ होती है…

या खुले बातिल के साथ।

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